बुधवार, 23 जनवरी 2013

माटी 
ना बना मुझे कोई प्याला, कोई सुराही,
मैं माटी हूँ, मुझे माटी ही रहने दे..

पहले बनूँ, फिर टूटूं, फिर माटी में मिल जाऊँ,
ये चक्र बहुत असहाय है, बस मुझे माटी ही रहने दे...

तू बनाएगा मुझे, अग्नि में तपाएगा मुझे, 
जग इक पल में, मिटाएगा मुझे, बस मुझे माटी ही रहने दे ...!!

कलम 
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पूछ रही है कलम,
क्यूँ मुझसे बात नहीं करती,
क्यूँ मेरी स्याही में,
अपना दर्द नहीं भरती....

कैसे सह लेती है,
चुपके से तू हर टीस,
ज़ख्म पाक चुके हैं दिल के,
रहा है लहू रीस,
क्यूँ इनके नासूर बनने से,
तू नहीं डरती .... 

मैं हंसकर बोली,
अरी तू है मेरे बचपन की सहेली,
क्या तुझको मालूम नहीं,
जिंदगी है इक पहेली,
बेफिक्र रह, जब तक तू ना टूटे,
मैं नहीं मरती ....,

बस यह मत पूछ,
मैं तेरी स्याही में,
अपना दर्द, क्यूँ नहीं भरती.....!!!